कबूतरी देवी: पहाड़ पर पत्थर तोड़ती मजदूर लोकगायिका

आज पनि जौं-जौं, भोल पनि जौं-जौं…’ गीत से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने वालीं उत्तराखंड की मशहूर लोकगायिका कबूतरी देवी का हाल ही में निधन हुआ. मेरे लिए शर्मिंदगी की बात यह है कि मुझे उनकी मौत से कुछ समय पहले ही उनके बारे में कई अहम जानकारियां मिल सकीं और अब मैं उनपर लिख भी रहा हूं. कबूतरी के इस गीत को दुनिया भर में फैले उत्तराखंड के प्रवासियों के अलावा नेपाल में भी खूब प्यार मिला.
इस गीत में कुछ शब्द नेपाल से भी आए हैं और इस लिहाज से यह गीत पुराने समय में भारत और नेपाल की साझा संस्कृति का प्रतीक भी है. इसके अलावा, इस गीत में हमें दोनों देशों को बांटने वाली महाकाली नदी और दूसरे प्राकृतिक बिंब और वहां की सामाजिक स्थितियों का रूपण भी देखने को मिलता है.
साज बजाने हाथों से तोड़े पत्थर
उत्तराखंड की मिरासी (दलित) जाति से आने वालीं कबूतरी का जीवन संघर्ष उत्तराखंड की आम महिलाओं जैसा ही दूभर रहा, बल्कि एक बंद समाज और शिल्पकार (दलित) जाति में पैदा होने की वजह से यह उस स्तर तक कष्टप्रद रहा कि इसे महसूस करना अधिकतर के लिए बहुत मुश्किल होगा. कबूतरी जिन हाथों से साज बजाती थीं, उन्हीं हाथों से पत्थर भी तोड़ती थीं.
उत्तराखंड के दलितों की आजीविका का पारंपरिक साधन खेतिहर मजदूरी, पत्थर तोड़ना, भवन निर्माण, कृषि यंत्र और औजार बनाना और ऋतुओं के त्योहारों, शादियों और दूसरे उत्सवों में नृत्य और गायन रहा है. कबूतरी ने भी अपने माता-पिता और नानी से सात साल की उम्र से ही गायन सीख लिया था. कम उम्र में ही उनकी शादी दीवानी राम से हो गई, जो उनके लिए गीत लिखते थे और वह विभिन्न मंचों पर उन्हें गाती थीं. वही उन्हें आकाशवाणी तक भी ले गए.
आकाशवाणी ने दी पहचान
कबूतरी ने 1970 और 80 के दशक में आकाशवाणी नजीबाबाद, रामपुर, लखनऊ और मुंबई के विभिन्न भाषा के कार्यक्रमों में गायन किया. लखनऊ दूरदर्शन केंद्र से भी उनके गायन का प्रसारण हुआ. उनकी दर्जन भर से ज्यादा रिकॉर्डिंग ऑल इंडिया रेडियो के पास हैं. इसके अलावा उन्होंने क्षेत्रीय त्योहारों, रामलीलाओं, उत्तरायणी पर्वों जैसे कई मंचों पर भी गायन किया, जिसे शायद ही संरक्षित किया गया हो. पति की मृत्यु के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन से दूरी बना ली और वह उत्तराखंड के सीमांत जिले- पिथौरागढ़ के अपने घर में रहकर मजदूरी करके अपने परिवार को पालने लगीं.
2002 में पिथौरागढ़ के छलिया महोत्सव में नवोदय पर्वतीय कला मंच उन्हें फिर से लोगों के सामने लाया और 2004 में उन्हें उत्तरा पत्रिका की संपादिका डॉ. उमा भट्ट, युगमंच, पहाड़ और नैनीताल समाचार के प्रयासों से नैनीताल में फिर से रीलॉन्च किया गया. यहां से कबूतरी का दूसरा दौर शुरू हुआ. संस्कृतिकर्मी और नाटककार जहूर आलम बताते हैं कि इस सफल कार्यक्रम को मीडिया ने भी खूब कवरेज दी और इसके बाद उन्हें देश भर से गायन के लिए बुलाया जाने लगा. डॉ. उमा भट्ट के प्रयासों से कबूतरी देवी पर एक डॉक्यूमेंटरी भी तैयार हो चुकी है. इसे कबूतरी देवी के सामने ही लोकार्पित करना था कि उनका असमय निधन हो गया.
बेगम अख्तर, तीजनबाई और कबूतरी
बुलंद आवाज की मलिका कबूतरी देवी ने संगीत की औपचारिक दीक्षा नहीं ली. जहूर आलम बताते हैं कि वह ऋतुरैण (मौसम के गीत), चौती, न्योली, छपेली, धुस्का के साथ ही अपने अंदाज में गीत, गजल और ठुमरी भी गाती थीं. उन्हें उत्तराखंड की तीजनबाई या पहाड़ की बेगम अख्तर भी कहा जाता है. उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोककलाओं का अध्ययन करने वाले डॉ. गिरिजा पांडे के मुताबिक कबूतरी ने अपने श्रोताओं के लिए कई बार बेगम अख्तर को भी गाया है. बेगम अख्तर और कबूतरी दोनों को बुलंद गले की गायिकाओं के तौर पर जाना जाता है. संस्कृतिकर्मी और नाटककार जहूर आलम कहते हैं कि कबूतरी देवी की बुलंद आवाज और खनकदार गले के साथ ही उनकी खरजदार आवाज एक हद तक बेगम अख्तर की गायिकी की याद दिलाती थी.
हालांकि, उत्तराखंड के रंगकर्मी और संस्कृति के अध्येता इस तुलना से सहमत नहीं दिखते. इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि तीजन ने पांडववाणी (महाभारत की कथा) गाई है, जबकि कबूतरी के गायन में अधिकांश प्रकृति, विरह (नियोली) और प्रेम के गीत हैं और दैवीय गीत यदाकदा ही आए हैं. संस्कृति और मीडिया के अध्येता डॉ. भूपेन सिंह कहते हैं कि जिस तरह तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की कबूतरी देवी नहीं कहा जा सकता, उसी तरह कबूतरी को उत्तराखंड की तीजनबाई कहना सही नहीं है, मीडिया को ऐसी तुलनाओं से बचना चाहिए. वह कहते हैं कि दोनों गायिकाओं के परिवेश, सामाजिक परिस्थितियां और भूभाग भिन्न रहे, इसलिए उन्हें इन्हीं संदर्भों के साथ देखा जाना चाहिए.
हां, अनिल कार्की कबूतरी को प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने के संदर्भ में बेगम अख्तर कहने के हामी हैं, हालांकि बाद में गजल गायिकी के शास्त्रीय गायन के ढांचे में आने से उन्हें बेगम अख्तर कहा जाना भी अनिल को सही नहीं लगता. इस तुलना को वह सरलीकरण कहते हैं. अनिल कहते हैं कि तीजन और बेगम ने लोक को शास्त्र में ढालने की कोशिश की, जो कि कबूतरी के गायन में नहीं मिलता. वह बताते हैं, कबूतरी के आकाशवाणी में गाने से कुमाऊंनी संगीत भी अकादमिक हुआ और यह मुक्त लोक से 5-6 मिनट की सीमाओं में बंध गया.
कबूतरी के गायन में पहाड़ की झलक
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी ने गायन को अपना पूर्णकालिक पेशा नहीं बनाया, शायद इसलिए उन्हें इतना नाम नहीं मिला. उत्तराखंड के उभरते रंगकर्मी और साहित्यकार डॉ. अनिल कार्की बताते हैं कि उनसे एक बार कबूतरी देवी के गायन दल के ही वरिष्ठ सदस्य और उन्हें सिखाने वाले (दलित) लोकगायक भानुराम सुआकोटी ने कहा था कि वह कैसेट बेचने के लिए नहीं गाते हैं. समझा जा सकता है कि कबूतरी का गायन भी बाजार से प्रसिद्धि और कमाई करने की चाहत से परे था. अनिल बताते हैं कि कबूतरी बिना तामझाम, मंचीय आडंबर के कहीं भी, कभी भी गाने को तैयार रहती थीं.
कबूतरी हारमोनियम और हुड़के (हाथ से बजाया जाने वाला डमरू जैसा और छोटे ढोल के आकार का वाद्ययंत्र) के साथ गाती थीं. वह अपने पति के साथ कार्यक्रमों में हिस्सा लेने जाती थीं. तब पहाड़ों तक सड़कें नहीं पहुंची थीं और पैदल ही चला जाता था. इसी दौरान वह रास्ते में पति दीवानी राम के रचे गीतों को यादकर गायिकी का अभ्यास (रियाज) करती थीं. उनके गीतों में पलायन, विरह, मौसम, चिड़िया, पहाड़, नदी-नौले, जंगल, बैल-भैंस, रात-दिन, चांद-तारे, घास के मैदान और मंदिरों का जिक्र देखने को मिलता है.

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