खरबपति अमेज़ॉन की नज़र अब हिंदी बाज़ार पर
ऑनलाइन शॉपिंग की बड़ी कंपनी अमेज़ॉन ने अब अपनी वेबसाइट का हिंदी वर्ज़न बाज़ार में उतारा है.
अमेज़ॉन की हिंदी वेबसाइट का यह वर्जन मोबाइल और स्मार्टफ़ोन ऐप के लिए बनाया गया है. इसके ज़रिए अमेज़ॉन भारतीय ग्राहकों के और ज़्यादा करीब पहुंचना चाहती है.
केपीएमजी-गूगल की एक स्टडी ने बताया है कि साल 2021 तक हिंदी भाषी इंटरनेट यूज़र की संख्या अंग्रेजी भाषी लोगों से ज़्यादा हो जाएगी.
अमेज़ॉन के इस कदम को फ़्लिपकार्ट के लिए एक चुनौती के तौर पर माना जा रहा है. फ़्लिपकार्ट भारत की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेलर कंपनी है जिसका स्वामित्व वॉलमार्ट के पास है.त में ई-कॉमर्स का बाज़ार लगभग 3300 करोड़ डॉलर का है.
अमेज़ॉन इंडिया में कैटेगरी मैनेजमेंट के उपाध्यक्ष मनीष तिवारी ने समाचार वेबसाइट रायटर्स से कहा है, ''अमेज़ॉन की हिंदी वेबसाइट बनाना एक बेहद अहम कदम है जिससे हम 10 करोड़ और ग्राहकों तक अपनी पहुंच बना पाएंगे.''
भारत में बहुत से ग्राहक छोटे शहरों और गांवों से ताल्लुक रखते हैं जिनके लिए अंग्रेज़ी एक मुश्किल माध्यम है.
माना जा रहा है कि अमेज़ॉन ने यह कदम तब उठाया जब उसे भारत में वॉलमार्ट की तरफ़ से लगातार चुनौती मिल रही थी.
हाल ही में वॉलमार्ट ने ई-कॉमर्स की दुनिया का सबसे बड़ा अधिग्रहण करते हुए 1600 करोड़ डॉलर में फ़्लिपकार्ट को खरीदा था. ज़ीदियों की पैतृक भूमि पर एक विशाल अक्षय पहाड़ सिंजार खड़ा है. सताये गए यज़ीदी लोग इसे अपने संरक्षक के रूप में देखते हैं.
उनके परिवार के तंबू में एक पतली चटाई पर बैठ कर बात करने के दौरान हेड शिंगाले कहते हैं, "सिंजार पहाड़ ने हमें ही नहीं बल्कि कई अन्य यज़ीदियों को चार साल पहले बचाया था."
उनके रहने की यह व्यवस्था इराक के सुदूरवर्ती इलाके में पहाड़ी पर बने तंबूओं में से एक है.
प्लास्टिक शीट वाली एक खिड़की से हम सिंजार की चट्टानी ढलानों को देख सकते हैं जो हरी झाड़ियों से अटी पड़ी हैं.
2014 में इराक और पड़ोसी सीरिया में कथित इस्लामिक स्टेट के लड़ाको के खूनी हमलों के दौरान हेड का परिवार और उनके साथ ही हज़ारों यज़ीदी अपनी जान बचाकर गांव से भागे और यहां आ कर बस गए.ब भले ही आईएस गुट का नियंत्रण इस इलाके पर नहीं है, लेकिन उनके हमलों के चार साल बाद भी हेड का परिवार और कई अन्य लोग आज भी इन ढलानों पर रह रहे हैं.
वो डरे हुए हैं कि आईएस लड़ाके कहीं फिर से लौट ना आएं.
उनके तंबू में हम जब पारंपरिक चाय और ताज़ा अंजीर खा रहे थे तो उन्होंने कहा, "हम अपने पड़ोसियों पर भरोसा नहीं करते. जब आईएस हमारे गांव में आए तो उन्हें यज़ीदियों के बारे में कुछ भी पता नहीं था. हमारे मुस्लिम पड़ोसियों ने उन्हें बताया कि यज़ीदी ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं और हम मुसलमान नहीं हैं."
वो याद करते हैं, "आईएस ने पुहुए उस हमले के बाद ही अमरीका आईएस के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान में शामिल हुआ. पश्चिमी हेलिकॉप्टर्स से सिंजार पहाड़ पर पानी और खाना भी गिराया गया था. जब यह ख़बर आई कि भूख और डिहाइट्रेशन से यज़ीदियों की मौत हो रही है.
भागने के दौरान फेंके गए गांव वालों के कपड़े अब भी पहाड़ पर कूड़े की तरह बिखरे पड़े हैं- जो एक दर्दनाक अतीत की याद दिलाते हैं.
यज़ीदियों को लगता है कि दुनिया ने उन्हें त्याग दिया है.
सिंजार की तलहटी में बसा शहर अब पूरी तरह से नष्ट हो चुका है. आईएस हमलावरों के रखे बम यहां मलबे के ढेर में आज भी पड़े हैं.
जिन्हें लगता है कि उन्हें भुला दिया गया है, उनके लिए यह भूलना बहुत मुश्किल है कि जब से आईएस ने उनकी ज़िंदगी तबाह की है तब से उन पर क्या-क्या गुज़री है.
रुषों को मार डाला, महिलाओं को ग़ुलाम बनाने के लिए इराक और सीरिया के बाज़ारों में बेच दिया."
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